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Sunday, 17 June 2012

Pilgrim places and wishes

अगर मे ये कहु के मुजे अगर मौका मिले तो मे विदेश जाऊंगा उसके लिए प्रयत्न करूंगा और अगर इसके बदले  मे ये कहु के मुजे कैसे भी करके विदेश जाना ही है तो इन दोनों मे क्या फर्क है ? फर्क सिर्फ इतना ही है पहले विधान के साथ लागणी(इमोशन) जुड़ी नहीं है और दूसरे विधान के साथ स्ट्रॉंग इमोशन जुड़ी है । इस से क्या फर्क पड़ता है  ? हमारे विचार जो हे वो ऊर्जा का एक मूलभूत स्वरूप है पर वो बहुत ही सूक्ष्म स्वरूप मे है । जैसे की हमारे वपराश मे है रुपैया वो सूक्ष्म रूप है अगर आपको कोई घर ,जमीन खरीदना है तो लाखो रुपये लगते है या अगर आप दरवाजे को हाथ से थप थपा ओगे तो कुछ नहीं होगा अगर हाथ मे हथोड़े से दरवाजे पर मारोगे तो दरवाजा टूट जाएगा ये सवाल ऊर्जा के स्तर लेवेल का है अगर ऊर्जा कम होगी तो परिणाम नहीं मिलेगा अगर ऊर्जा ज्यादा मात्र मे होगी तो परिणाम प्राप्त होता है  जेसे   के दरवाजे का टूटना .
     इसी तरह हमारे जो विचार है अगर उनको अधिक मात्र मे ऊर्जा मिले तो  उसका वाइब्रेशन लेवेल बढ़ के वो विचार हकीकत बन जाएगा । इसका एक स्वरूप है मंत्रयोग जिस मे एक मंत्र को कई लाख बार जप किया जाता है उतनी बार रिपीट होता है की उसकी ऊर्जा बढ़ जाती है । अगर एक ही विचार को बार बार लगातार करते रहेंगे तो उसकी ऊर्जा बढ़ते बढ़ते वो हकीकत मे पलट जाएगा । या अगर आप उस विचार के साथ अपनी लागणी (इमोशन) जोड़ देंगे तो भी विचार की ऊर्जा बढ़ जाएगी और जैसे जैसे इमोशन की तीव्रता बढ़ेगी विचार हकीकत मे पलट जाएगा । या आप उसे ऊर्जा देके भी हकीकत मे बदल सकते है .
                      हमारे ज्यादातर धार्मिक स्थल है वो जंगल , पहाड़ , नदी किनारे ,समुद्र किनारे होते है । ऐसा क्यू होता है ? क्यो की वो सभी जगह कुदरती तोर पे ऊर्जा की मात्र बहोत अधिक होती है । इससे क्या होता है ? यह सभी जगह हमारे लिए शॉर्ट कट वाला रास्ता बन जाता है जिससे हम अपनी मनोकामना जल्दी पूरी कर सकते है दुखो से छुटकारा मिल सकता है । पर ये कैसे ? उस धार्मिक स्थल पर अधिक ऊर्जा होने से वहा पर हम जो विचार करते है संकल्प लेते है उसमे अधिक ऊर्जा मिलती है जिस से वो हकीकत मे पलट जाते है । एक आम आदमी को  लिए मंत्र जप के लिए समय नहीं मिलता और विचार के साथ तीव्र इमोशन जोड़ने मे भी उसे आसानी नहीं रहेती इसी लिए वो इन धार्मिक स्थान पे जाके आसानी से अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकता है अपने दुखो से छुटकारा मिल सकता है . 

Tuesday, 29 May 2012

The Ultimate Truth

चाहे आप कोई भी हो चाहे पंडित हो चाहे अनपढ़ हो चाहे गरीब हो चाहे करोड़पति चाहे कोई साधू हो संत तो महात्मा हो चाहे चोर हो ठग हो कातिल हो आपको एक दिन भगवान , प्रभु , ईश्वर के दर्शन अवश्य होंगे और आप उनसे एक हो जाएंगे 
     चाहे आप इस बात को माने या न माने चाहे ईश्वर भगवान मे मानते हो या न मानते हो फिर भी आपको एक दिन उसके दर्शन अवश्य होंगे ।  बड़े  से बड़े नास्तिक को और बड़े से बड़े गुनेगार को भी एक दिन भगवान के दर्शन अवश्य होंगे यह एक परम सत्य है यह कभी जुठ नहीं हो शकता । आप चाहे आज ना मानते हो लेकिन कुछ और जन्मो के बाद आप ये मानने लगेंगे और इसके लिए क्रियाशील भी होंगे और आगे बढ़ते बढ़ते आपको एक दिन उस परम पिता के दर्शन अवश्य होंगे यही सत्य है 
  यह एक अंतिम सत्य है । हमारा सर्जन परम पिता मे से ही होता है और घूम फिरकर  अंत मे हमे उस से एक होना होता ही है

Thursday, 17 May 2012

why directions and magnetism

 

दिशा क्या होती है ? तंत्र मे क्यू इसको महत्व देते है ?
पृथ्वी जो हे वो माग्नेटिक है मतलब उसका उतर और दक्षिण ध्रुव होते है पोलरिटी होती है
उतर ध्रुव जो हे वो पॉज़िटिव  उर्जा से युक्त होता है और दक्षिण ध्रुव जो हे वो नेगेटिव उर्जा वाला
होता है मतलब उतर ध्रुव पर पॉज़िटिव एनर्जि आती है और नेगेटिव एनर्जि जो हे वो दक्षिण
ध्रुव से बाहर निकलती है
       हमारा शरीर भी मागनेटिक है उसमे शिर जो हे वो उत्तर ध्रुव है और  पैर दक्षिण ध्रुव हैं
अगर पृथ्वी के माग्नेटिस्म से हमारे शरीर का माग्नेटिस्म समांतर रहेगा तो हमे काफी उर्जा
आसानी से बिना कुछ किए मिलेगी जो ध्यान जप तप मे बहोत ही जरूरी है और अगर हमारे
शरीर का मेग्नाटिस्म पृथ्वी के मेग्नाटिस्म के विपरीत रहेग तो ध्यान लगाना एकाग्रता रखना
काफी कठिन होगा । इसी लिए तंत्र मे हर कार्य के अनुसार अलग अलग दिशा का वर्णन होता है
    आप अगर एक  लोहे के अणु की रचना देखेंगे और एक मेग्नाट की अणु की रचना देखेंगे
 तो आपको फर्क साफ दिखाई देगा लोहे मे अणु अस्त व्यस्त होते है सब अलग अलग दिशा मे
घूमते है और मेग्नाट मे सब अणु एक ही दिशा मे होंगे एक ही लाइन मे होंगे । इससे क्या फर्क
पड़ता है ? अगर आप के पास एक लेंस और कागज़ होगा तो आसानी से समज जाएंगे ।
इसमे पदार्थ के अणु की जगह सूर्य प्रकाश को लेना है अगर लेंस की मदद से सूर्य के सभी किरणों
को कागज़ पर एकत्रित करेंगे तो थोड़ी ही देर मे कागज़ जल उठेगा । क्यू जला कागज़ क्यू की
लेंस द्वारा सूर्य से सभी किरणों को एक ही जगह केंद्रित किया गया और प्रचंड उर्जा उत्पन्न होगई
जिसने कागज़ को जला दिया तो अब आप को समज आगया होगा के अणु का अस्त व्यस्त होना
और एक दिशा मे होने से क्या फर्क पद सकता है
           इसी तरह पदार्थ के अणु सूर्य प्रकाश की किरणों की जगह हमारे मन के विचार को रख देंगे तो आपको मालूम पड़ेगा की मन से सभी विचारो को एक ही जगह केंद्रित करने से कितनी
प्रचंड उर्जा उत्पन्न होगी । वो प्रचंड उर्जा आपके मन के संकल्प को हकीकत बनादेगी क्यू की
प्रचंड उर्जा से कुछ भी निर्माण हो सकता है

Wednesday, 16 May 2012

the Basic Qualifications

अगर आपके पैर मे बेडी होगी तो आप ठीक से चल भी नहीं पाएंगे तो कैसे दोड़ पाएंगे ?
ठीक इसी तरह हमारे मन मे काम क्रोध लोभ मोह जैसे अशुद्धीय रूप बेडी होंगी तो इष्ट के
दर्शन कैसे होंगे ? परमात्मा से कैसे मिलाप होगा ? कैसे अध्यात्म मे आगे यात्रा बढ़ेगी
कैसे योग मंत्र यंत्र तंत्र मे सफलता मिलेगी ?
   इन अशुद्धियों का त्याग तो करना ही होगा अन्यथा बेडी पहेंकर कितना भी चले मंज़िल
नहीं मिलेगी । मंज़िल पाने के लिए तो कठिन परिश्रम करना पड़ेगा तेज़ दोड़ लगानी पड़ेगी
तभी जाकर मंज़िल मिलेगी
       बेडी चाहे सोने की हो चाँदी की हो लोहे की हो या कोई और हो वो तो बेडी ही रहेगी बेडी सोने की भी होगी तो फायदा क्या उसका जो कोई कम न आए बेडी तो हर हाल मे बेडी ही रहेगी
हर हाल मे उसे निकालना ही पड़ेगा । चाहे मे अपने स्वार्थ के लिए अपने शत्रु से नफरत करू या
किसी ओर से नफरत करू वो तो नफरत ही रहेगी इसी लिए अपने मन के सभी दोष अशुधिया
जो बेडी स्वरूप है उनको बाहर निकालना ही होगा अन्यथा चलना बंद कर देना चाहिए

Monday, 5 March 2012

परिचय

मुद्रा
मुद्रा पूजा का एक अभिन्न अंग है इसके अभाव में की गई पूजा का देवता स्वीकार नहीं करते .जब हम सब मंदिर में जाते है तो क्या करते है ? भगवान के सामने हाथ जोड़ के मस्तक को जुकाते है यह भी एक मुद्रा ही है यह एक आवश्यक है इसी तरहा देव पूजा में भी मुद्रा आवश्यक है
  मुद्रा के बारे में शास्त्रों में लिखा है की मुद्रा से देवता प्रसन्न होते है और अभीष्ट सिद्धि मिलती है यह एक तरह की मास्टर की है जो आप के लिए सीक्रेट दरवाजे खोलती है और आप को आगे बढ़ाती है आप के लक्ष्य की और .
 मुद्रा के कई प्रकार है जैसे हस्त मुद्रा जो मुद्रा हम आपने हाथ और उंगलियों से बनाते है यह मुद्रा ज्यादातर देव पूजा में और ध्यान में और  रोग चिकिस्ता में होता है कुछ मुद्रा में पुरे शरीर का उपयोग होता है इनका प्रयोग ज्यादातर योग अभ्यास में किया जाता है
मातृका 
वैसे मातृका शब्द मात्रु माता से आया है जिसका मतलब है माँ वोह सबकी माँ है सभी मंत्र उसी मैसे बनते है उसकी पूजा से सर्व देव और देवी का पूजन होता है मातृका पूजन के अभाव में किया गया कोई भी पूजन अपूर्ण रहता है इसके पूजन से ही पूजा में पूर्णता होती है । वैसे सभी स्वर अ आ इ ई .......और  सभी व्यंजन क ख ग ..........क्ष  को ही मातृका कहते है . १६ स्वर और ३४ व्यंजन को मिलकर ५0 अक्षरों से मातृका बनती है और इसी मातृका से सभी मंत्र बनते है  

न्यास 
न्यास का मतलब है स्थापित करना । न्यास के द्वारा हम अपने शरीर में मंत्र की दैवी शक्ति शक्ति को अपने अन्दर स्थापित करते है क्यू की शास्त्रों में कहा गया है की देव की पूजा देव बनकर ही की जाती है और न्यास से हमारा शरीर दिव्य हो जाता है न्यास में हम न्यास के मंत्र बोलते  है और उसके सम्बन्धी अंग का स्पर्श ऊँगली से करते है ।
  न्यास करने के लिए भी मुद्रा का प्रयोग करना पड़ता है   
श्रीविद्या की उपासना तो मुद्रा और न्यास के बिना संभव ही नहीं है