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Monday, 5 March 2012

परिचय

मुद्रा
मुद्रा पूजा का एक अभिन्न अंग है इसके अभाव में की गई पूजा का देवता स्वीकार नहीं करते .जब हम सब मंदिर में जाते है तो क्या करते है ? भगवान के सामने हाथ जोड़ के मस्तक को जुकाते है यह भी एक मुद्रा ही है यह एक आवश्यक है इसी तरहा देव पूजा में भी मुद्रा आवश्यक है
  मुद्रा के बारे में शास्त्रों में लिखा है की मुद्रा से देवता प्रसन्न होते है और अभीष्ट सिद्धि मिलती है यह एक तरह की मास्टर की है जो आप के लिए सीक्रेट दरवाजे खोलती है और आप को आगे बढ़ाती है आप के लक्ष्य की और .
 मुद्रा के कई प्रकार है जैसे हस्त मुद्रा जो मुद्रा हम आपने हाथ और उंगलियों से बनाते है यह मुद्रा ज्यादातर देव पूजा में और ध्यान में और  रोग चिकिस्ता में होता है कुछ मुद्रा में पुरे शरीर का उपयोग होता है इनका प्रयोग ज्यादातर योग अभ्यास में किया जाता है
मातृका 
वैसे मातृका शब्द मात्रु माता से आया है जिसका मतलब है माँ वोह सबकी माँ है सभी मंत्र उसी मैसे बनते है उसकी पूजा से सर्व देव और देवी का पूजन होता है मातृका पूजन के अभाव में किया गया कोई भी पूजन अपूर्ण रहता है इसके पूजन से ही पूजा में पूर्णता होती है । वैसे सभी स्वर अ आ इ ई .......और  सभी व्यंजन क ख ग ..........क्ष  को ही मातृका कहते है . १६ स्वर और ३४ व्यंजन को मिलकर ५0 अक्षरों से मातृका बनती है और इसी मातृका से सभी मंत्र बनते है  

न्यास 
न्यास का मतलब है स्थापित करना । न्यास के द्वारा हम अपने शरीर में मंत्र की दैवी शक्ति शक्ति को अपने अन्दर स्थापित करते है क्यू की शास्त्रों में कहा गया है की देव की पूजा देव बनकर ही की जाती है और न्यास से हमारा शरीर दिव्य हो जाता है न्यास में हम न्यास के मंत्र बोलते  है और उसके सम्बन्धी अंग का स्पर्श ऊँगली से करते है ।
  न्यास करने के लिए भी मुद्रा का प्रयोग करना पड़ता है   
श्रीविद्या की उपासना तो मुद्रा और न्यास के बिना संभव ही नहीं है